Wednesday, September 1, 2010

ज़िन्दगी में चलते चलते एक बात समझ में आई

ज़िन्दगी में चलते चलते एक बात समझ में आई
जीवन के हर एक पल में ख़ुशी है समाई
जो जी लेता इस पल को भरपूर
उसे हर पल देता ख़ुशी और बधाई

Tuesday, August 10, 2010

ज़िन्दगी ने हमें क्या क्या रंग दिखलाया

ज़िन्दगी ने हमें क्या क्या रंग दिखलाया
कभी ज़ख्मों में हसंया
कभी बिना ज़ख्मों के रुलाया
कभी हम हसते रहे बेवजह
कभी वज़ह में भी हसना ना आया
ज़िन्दगी ने हमें क्या क्या रंग दिखलाया
कभी हमारा वक़्त कटता ही नहीं
कभी वक़्त की कमी ने रुलाया
कभी अपनों में प्यार ना दिखा
कभी ये प्यार बेगानों में नज़र आया
ज़िन्दगी ने हमें क्या क्या रंग दिखलाया
ज़िन्दगी ने हमें क्या क्या रंग दिखलाया

Thursday, February 11, 2010

उनकी पहल का इंतज़ार

हम तो उनकी पहल का इंतज़ार करते रहे
उनका बस सपनो में दीदार करते रहे
वो आये ही नहीं कभी हमारे करीब
हम इंतज़ार के इस समुन्दर को आंसुओं से भरते रहे

Wednesday, January 27, 2010

वो यादों के साथ आ गयी

आज तनहाई में बैठे बैठे उनकी याद आ गयी
आँखों के आगे फिर वो पुरानी बात आ गयी
पर उनकी यादों से तनहाई कुछ कम लगने लगी
ऐसा लगा जैसे वो इन यादों के साथ आ गयी

Monday, January 25, 2010

ज़िन्दगी से कोई गिला नहीं

ज़िन्दगी से हमें कुछ मिला नहीं
ज़िन्दगी में कोई फूल हमारा खिला नहीं
पर शायद ज़िन्दगी से उम्मीद करना ही बेमानी थी
इस लिए हमें ज़िन्दगी से कोई गिला नहीं

Sunday, January 24, 2010

ज़िन्दगी हमे क्या क्या रंग दिखलाये

ज़िन्दगी हमे क्या क्या रंग दिखलाये

कभी खुशियों की बारिश कभी गम के साये

कभी तलाब के पानी की तरह शांत थी ज़िन्दगी

कभी तेज़ समुंदर सी लहरों में हम नाहये

ज़िन्दगी हमे क्या क्या रंग दिह्क्लाये

कभी सोये हम मां के आंचल तले

कभी घने बादलों के साये में तनहा चले

ये ज़िन्दगी और पता नहीं क्या क्या रंग दिखलाएगी

हम भी इस ज़िन्दगी की राहों पे तनहा चल चले

ज़िन्दगी हमे क्या क्या रंग दिह्क्लाये

कभी खुशियों की बारिश कभी गम के साये

कल रात वो मेरे सपने में आई

कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई
उसकी आँखों में हया की कसक थी
उसकी नज़रें भी थीं थोड़ी घबराई
कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई
उसको देख के लगा की मेरी आँख न खुले
ये रात न रुके बदती ही चले
सुबह का सूरज आज थम जाए
और ये रात कभी न ढले
कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई
उनको बोलना चाहते थे हम अपने दिल की बात
सब बता देना चाहते थे आज रात
डर था कल कह सकेंगे या नहीं
कहीं दिल में ही न रह जाये ये बात
कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई
हम तो सपने भी उनसे कहने की हिम्मत जुटा न सके
उनकी चहरे से अपनी नज़रें हटा न सके
उनको देखते देखते सारी रात कट गयी
हम अपने आपको इस गम से छुटा न सके
कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई
रात ढल गयी हो गया सवेरा
सामने था मेरे नया दिन मेरा
मैं उठा थोडा सा मुस्कराया
क्योंकि मेरी आँखों में था उनकी तस्वीर का बसेरा
कल रात वो मेरे सपने में आई
थोडा हसीं थोडा शरमाई